देश के पूर्वोत्तर में मानो नाम का एक गांव था। गांव में मनु नामक एक व्यक्ति रहता था। उसके परिवार में पति-पत्नी और उनका एक गुस्सैल बेटा था। मनु के बेटे को बहुत अधिक गुस्सा आता था।
उसकी इस प्रवृति को देखते हुए उसके पिता ने एक दिन उसे कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि अब जब भी उसे गुस्सा आए तो वह बाहर की बाड़ पर एक कील गाड़ दे। पहले दिन बच्चे ने बाड़ पर 57 कीलें गाड़ीं।
अगले कुछ सप्ताह के दौरान धीरे-धीरे बाड़ पर ठोकी गई कीलों की संख्या में कमी आती गई और उसने अपने गुस्से को क़ाबू में करना सीख लिया। मनु के बेटे ने पाया कि मजबूत बाड़ पर कील गाड़ने की तुलना में अपने गुस्से को क़ाबू करना कहीं अधिक आसान काम है।
आख़िर एक दिन ऐसा आ गया जब उसे कोई कील नहीं गाड़नी पड़ी। उसने अपने पिता को इस बारे में बताया और पिता ने उससे कहा कि अब वह हर उस दिन एक कील उखाड़े जिस दिन उसने अपने ग़ुस्से को पूरी तरह क़ाबू में रखा हो।
एक-एक करके इसी तरह कई दिन बीत गए और आख़िरकार वह दिन आया जब वह बालक वहां से सारी कीलें उखाड़ने में कामयाब हो गया। उसने अपने पिता को जाकर उत्साह से यह बात बताई। उसकी ख़ुशी में शरीक होते हुए पिता मनु उसका हाथ पकड़कर उसे वापस बाड़ के पास ले गया।
उसने कहा, ‘तुमने अपने गुस्से को पूरा क़ाबू कर बहुत अच्छा किया, मेरे बच्चे। लेकिन उस बाड़ के तमाम छेदों को देखो। वह बाड़ अब कभी भी पहले की तरह नहीं रहेगी। जब तुम गुस्से में कुछ कहते या करते हो तो अपने आसपास के लोगों पर हमेशा ऐसा ही एक निशान छोड़ जाते हो।’
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