It doesn't take a reason to love someone,
but it does to like someone. You don't love
someone because you want to, you love someone
because you are destined too. It's because you
fall in Love with them, that you then try to
find a reason, but you always come up with
the answer, No reason!
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Friday, February 4, 2011
ख़ुद निकाल लो या इंतजार करो
एक बच्चा अपनी मां के साथ किसी रिश्तेदार के घर गया हुआ था। बच्च बड़ा प्यारा था। रिश्तेदार ने जब मां को चाय बनाकर दी, तो बच्चे को भी कुछ देना जरूरी था। सो, वह टाफ़ियों से भरा मर्तबान ले आया। उसने ढक्कन खोलकर बच्चे से कहा, ‘बेटे, इसमें से जितनी चाहो, टाफ़ियां ले लो।’
और कोई बच्च होता, तो ख़ुश होकर तुरंत मर्तबान में हाथ डाल देता, पर इस बच्चे ने कुछ नहीं किया, चुपचाप खड़ा रहा। रिश्तेदार ने दुबारा कहा और मर्तबान उसके थोड़ा और पास ले गया। लेकिन बच्च टाफ़ियों को देखता रह गया, पर उसने हाथ नहीं बढ़ाया। अब तो अजीब स्थिति हो गई। न तो मेजबान ने, न मां ने सोचा था कि वह ऐसी बात करेगा।
मां जानती थी कि बच्चे को टाफ़ियां बहुत पसंद हैं, इसलिए उसे और ज्यादा हैरानी हो रही थी। मां को लगा कि बच्च रिश्तेदार के सामने झिझक रहा है, इसलिए इस बार उसने ख़ुद कहा कि बेटे टाफ़ियां निकाल लो। लेकिन बच्चे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, वह वैसे ही खड़ा रहा।
आख़िर रिश्तेदार ने एक मुट्ठी टाफ़ियां निकालीं और उन्हें बच्चे की दोनों जेबों में डाल दिया। बच्च ख़ुश। अब मां को बेहद उत्सुकता थी यह जानने की कि उसके बच्चे ने इस तरह की तहजीब आख़िर सीखी कहां से! वापसी में घर जाते हुए मां ने बच्चे से पूछा कि उसने टाफ़ियां ख़ुद क्यों नहीं निकालीं, तो बच्चे ने बड़ी गंभीरता से जवाब दिया, ‘मां, तुमने ध्यान नहीं दिया, अगर मैं अपने छोटे-से हाथ से टाफ़ियां लेता, तो आख़िर कितनी आ पातीं! लेकिन चाचाजी ने अपनी मुट्ठी में भरकर टाफ़ियां दीं, तो मेरी दोनों जेबें भर गईं।
जब हम ख़ुद लेते हैं, ख़ुद कोई इच्छा करते हैं, तो हमें अपेक्षाकृत कम ही मिलता है। लेकिन जब भगवान देता है, तो हमारी झोली उम्मीद से भी ज्यादा भर जाती है
और कोई बच्च होता, तो ख़ुश होकर तुरंत मर्तबान में हाथ डाल देता, पर इस बच्चे ने कुछ नहीं किया, चुपचाप खड़ा रहा। रिश्तेदार ने दुबारा कहा और मर्तबान उसके थोड़ा और पास ले गया। लेकिन बच्च टाफ़ियों को देखता रह गया, पर उसने हाथ नहीं बढ़ाया। अब तो अजीब स्थिति हो गई। न तो मेजबान ने, न मां ने सोचा था कि वह ऐसी बात करेगा।
मां जानती थी कि बच्चे को टाफ़ियां बहुत पसंद हैं, इसलिए उसे और ज्यादा हैरानी हो रही थी। मां को लगा कि बच्च रिश्तेदार के सामने झिझक रहा है, इसलिए इस बार उसने ख़ुद कहा कि बेटे टाफ़ियां निकाल लो। लेकिन बच्चे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, वह वैसे ही खड़ा रहा।
आख़िर रिश्तेदार ने एक मुट्ठी टाफ़ियां निकालीं और उन्हें बच्चे की दोनों जेबों में डाल दिया। बच्च ख़ुश। अब मां को बेहद उत्सुकता थी यह जानने की कि उसके बच्चे ने इस तरह की तहजीब आख़िर सीखी कहां से! वापसी में घर जाते हुए मां ने बच्चे से पूछा कि उसने टाफ़ियां ख़ुद क्यों नहीं निकालीं, तो बच्चे ने बड़ी गंभीरता से जवाब दिया, ‘मां, तुमने ध्यान नहीं दिया, अगर मैं अपने छोटे-से हाथ से टाफ़ियां लेता, तो आख़िर कितनी आ पातीं! लेकिन चाचाजी ने अपनी मुट्ठी में भरकर टाफ़ियां दीं, तो मेरी दोनों जेबें भर गईं।
जब हम ख़ुद लेते हैं, ख़ुद कोई इच्छा करते हैं, तो हमें अपेक्षाकृत कम ही मिलता है। लेकिन जब भगवान देता है, तो हमारी झोली उम्मीद से भी ज्यादा भर जाती है
क्या कहा गया और क्या अर्थ था
एक पहाड़ी रास्ते पर गाड़ियां आ-जा रही थीं। रास्ता बहुत घुमावदार था। अगले मोड़ से आगे क्या है, वाहन चालकों को कुछ अंदाज ही न हो पा रहा था। ऐसे में लोग न सिर्फ़ धीरे-धीरे गाड़ी चला रहे थे, बल्कि अन्य सावधानियां भी रख रहे थे। आने-जाने वाले वाहन चालक भी जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे से सूचनाएं साझा कर लेते थे।
ऐसे में, पहाड़ के ऊपर की तरफ़ से आती एक कार के ड्राइवर ने चलती गाड़ी की खिड़की से मुंह निकाला और नीचे से ऊपर की ओर जा रही गाड़ी के ड्राइवर की ओर देखते हुए जोर से चिल्लाया- ‘सुअर!’ उसने ऐसा पीछे की ओर आती गाड़ी को देखकर भी किया। यह सुनते ही अगले ड्राइवर की त्यौरियां चढ़ गईं।
उसे हैरानी हुई कि बग़ैर किसी कारण के उसे सुअर कहा गया और हैरानी से भी बढ़कर ग़ुस्सा आया। सो, उसने भी तत्काल खिड़की से सिर बाहर निकाला और चीख़ पड़ा- ‘कुत्ता।’
तब तक दोनों एक-दूसरे के पास से गुजर चुके थे। पहाड़ी रास्ता था। बीच में गाड़ी रोकी भी नहीं जा सकती थी। ‘सुअर’ सुनने वाले ड्राइवर को अब भी आश्चर्य हो रहा था कि उसे बेवजह ऐसा क्यों कहा गया। फिर उसने सोचा कि ऐसा करना उसकी आदत होगी, क्योंकि उसने पीछे आ रही गाड़ी के ड्राइवर के लिए भी यही कहा था।
उसने सोचा, दुनिया में भी अजीब लोग होते हैं। वह ऐसा सोचते हुए जा रहा था कि अचानक झाड़ियों से निकलकर एक सुअर सड़क पर आ गया और उसकी गाड़ी से टकराते-टकराते बचा। तब उसे समझ में आया कि उस ड्राइवर ने उसे सुअर कहकर गाली नहीं दी थी, बल्कि चेताया था।
किसी के शब्दों पर नहीं, उसकी भावनाओं पर ध्यान दें। शब्द और लहजा रूखा हो सकता है, लेकिन प्रतिक्रिया से पहले देख लें कि उन शब्दों का उद्देश्य हमारी ही भलाई तो नहीं
ऐसे में, पहाड़ के ऊपर की तरफ़ से आती एक कार के ड्राइवर ने चलती गाड़ी की खिड़की से मुंह निकाला और नीचे से ऊपर की ओर जा रही गाड़ी के ड्राइवर की ओर देखते हुए जोर से चिल्लाया- ‘सुअर!’ उसने ऐसा पीछे की ओर आती गाड़ी को देखकर भी किया। यह सुनते ही अगले ड्राइवर की त्यौरियां चढ़ गईं।
उसे हैरानी हुई कि बग़ैर किसी कारण के उसे सुअर कहा गया और हैरानी से भी बढ़कर ग़ुस्सा आया। सो, उसने भी तत्काल खिड़की से सिर बाहर निकाला और चीख़ पड़ा- ‘कुत्ता।’
तब तक दोनों एक-दूसरे के पास से गुजर चुके थे। पहाड़ी रास्ता था। बीच में गाड़ी रोकी भी नहीं जा सकती थी। ‘सुअर’ सुनने वाले ड्राइवर को अब भी आश्चर्य हो रहा था कि उसे बेवजह ऐसा क्यों कहा गया। फिर उसने सोचा कि ऐसा करना उसकी आदत होगी, क्योंकि उसने पीछे आ रही गाड़ी के ड्राइवर के लिए भी यही कहा था।
उसने सोचा, दुनिया में भी अजीब लोग होते हैं। वह ऐसा सोचते हुए जा रहा था कि अचानक झाड़ियों से निकलकर एक सुअर सड़क पर आ गया और उसकी गाड़ी से टकराते-टकराते बचा। तब उसे समझ में आया कि उस ड्राइवर ने उसे सुअर कहकर गाली नहीं दी थी, बल्कि चेताया था।
किसी के शब्दों पर नहीं, उसकी भावनाओं पर ध्यान दें। शब्द और लहजा रूखा हो सकता है, लेकिन प्रतिक्रिया से पहले देख लें कि उन शब्दों का उद्देश्य हमारी ही भलाई तो नहीं
कितने ग्राहक निबटाए
एक आदमी काम की तलाश में छोटे कस्बे से बड़े शहर में पहुंचा था। वह अपने कस्बे में भी अच्छा काम कर रहा था, लेकिन वहां तऱक्क़ी की गुंजाइश कम थी, इसलिए वह शहर आ गया था। शहर में उसने एक बड़ी दुकान के मैनेजर से संपर्क किया। दुकान क्या थी, पूरा का पूरा बाÊार था, जहां कील से लेकर वाहन तक, हर चीÊा मिलती थी।
कस्बे के उस आदमी ने मैनेजर से बात की। मैनेजर ने कहा कि सेल्समैन की जगह तो ख़ाली है, पर तुम्हें इस काम का कितना अनुभव है। उसने जवाब दिया, ‘अपने कस्बे में मैं बड़ा अच्छा सेल्समैन समझा जाता था।’ मैनेजर ने कहा, ‘वह तो एक दिन में ही पता चल जाएगा। तुम्हें आज दुकान में काम करना है। दिनभर के तुम्हारे प्रदर्शन के आधार पर तय होगा कि तुम यहां काम करने के काबिल हो या नहीं।’ इस तरह उस आदमी को मौक़ा मिल गया।
रात को दुकान का शटर गिरने के बाद मैनेजर ने उसे बुलाकर पूछा कि उसने दिनभर में कितने ग्राहकों को कुछ ख़रीदने के लिए राजी किया। उस आदमी ने जवाब दिया, ‘एक।’ मैनेजर ने कहा, ‘बस एक! हमारा एक औसत सेल्समैन दिनभर में 20-30 ग्राहकों को कुछ न कुछ बेच देता है और तुम बस एक ग्राहक को कुछ ख़रीदने के लिए राजी कर पाए! ऐसे में भला क्या नौकरी मिलेगी तुम्हें।
ख़ैर, तुमने कितने पैसों का सामान बेचा उसे?’ जवाब मिला, ‘12,26,632 रुपयों का।’ इतनी बड़ी रक़म सुनकर मैनेजर को बड़ा आश्चर्य हुआ। ‘ऐसा क्या बेच दिया तुमने उसे?’ उसे बेहद उत्सुकता हो रही थी। कस्बे के आदमी ने जवाब दिया, ‘पहले मैंने उसे मछली पकड़ने का छोटा कांटा बेचा, फिर मीडियम कांटा, फिर बड़ा कांटा। उसके बाद मैंने उसे मछली मारने की पूरी किट बेची। फिर मैंने उस ग्राहक से पूछा कि वह मछलियां पकड़ने कहां जाएगा। जब उसने बड़ी नदी का नाम लिया, तो मैंने उसे सुझाव दिया कि क्यों न वह एक मोटरबोट भी ख़रीद ले। मोटरबोट लेने के बाद उसे ख्याल आया कि उसकी पुरानी जीप बोट को ढोकर नदी तक नहीं ले जा पाएगी, तो उसने नई जीप के बारे में पूछताछ की। तब मैं उसे आटोमोटिव डिपार्टमेंट में ले गया और उसने लगे हाथ जीप और ट्रॉली भी ख़रीद ली।’
मैनेजर ने अविश्वास से लगभग चीख़ते हुए कहा, ‘वह मछली पकड़ने का कांटा लेने आया था और तुमने उसे इतना सबकुछ बेच डाला!’ उस आदमी ने जवाब दिया, ‘नहीं, दरअसल वह तो घर पर डिनर के लिए कैंडल लेने आया था। मैंने उससे कहा कि आप वीकएंड पर कैंडल लाइट डिनर का प्लान बना रहे हैं, यह अच्छी बात है। क्यों न उससे पहले आप मछली पकड़ने जाएं! इससे आपका पूरा दिन मौज-मस्ती में गुज़रेगा। और वह मान गया।
Moral
1. संख्या नहीं, गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है।
2. संभावनाओं का कोई ओर-छोर नहीं होता
कस्बे के उस आदमी ने मैनेजर से बात की। मैनेजर ने कहा कि सेल्समैन की जगह तो ख़ाली है, पर तुम्हें इस काम का कितना अनुभव है। उसने जवाब दिया, ‘अपने कस्बे में मैं बड़ा अच्छा सेल्समैन समझा जाता था।’ मैनेजर ने कहा, ‘वह तो एक दिन में ही पता चल जाएगा। तुम्हें आज दुकान में काम करना है। दिनभर के तुम्हारे प्रदर्शन के आधार पर तय होगा कि तुम यहां काम करने के काबिल हो या नहीं।’ इस तरह उस आदमी को मौक़ा मिल गया।
रात को दुकान का शटर गिरने के बाद मैनेजर ने उसे बुलाकर पूछा कि उसने दिनभर में कितने ग्राहकों को कुछ ख़रीदने के लिए राजी किया। उस आदमी ने जवाब दिया, ‘एक।’ मैनेजर ने कहा, ‘बस एक! हमारा एक औसत सेल्समैन दिनभर में 20-30 ग्राहकों को कुछ न कुछ बेच देता है और तुम बस एक ग्राहक को कुछ ख़रीदने के लिए राजी कर पाए! ऐसे में भला क्या नौकरी मिलेगी तुम्हें।
ख़ैर, तुमने कितने पैसों का सामान बेचा उसे?’ जवाब मिला, ‘12,26,632 रुपयों का।’ इतनी बड़ी रक़म सुनकर मैनेजर को बड़ा आश्चर्य हुआ। ‘ऐसा क्या बेच दिया तुमने उसे?’ उसे बेहद उत्सुकता हो रही थी। कस्बे के आदमी ने जवाब दिया, ‘पहले मैंने उसे मछली पकड़ने का छोटा कांटा बेचा, फिर मीडियम कांटा, फिर बड़ा कांटा। उसके बाद मैंने उसे मछली मारने की पूरी किट बेची। फिर मैंने उस ग्राहक से पूछा कि वह मछलियां पकड़ने कहां जाएगा। जब उसने बड़ी नदी का नाम लिया, तो मैंने उसे सुझाव दिया कि क्यों न वह एक मोटरबोट भी ख़रीद ले। मोटरबोट लेने के बाद उसे ख्याल आया कि उसकी पुरानी जीप बोट को ढोकर नदी तक नहीं ले जा पाएगी, तो उसने नई जीप के बारे में पूछताछ की। तब मैं उसे आटोमोटिव डिपार्टमेंट में ले गया और उसने लगे हाथ जीप और ट्रॉली भी ख़रीद ली।’
मैनेजर ने अविश्वास से लगभग चीख़ते हुए कहा, ‘वह मछली पकड़ने का कांटा लेने आया था और तुमने उसे इतना सबकुछ बेच डाला!’ उस आदमी ने जवाब दिया, ‘नहीं, दरअसल वह तो घर पर डिनर के लिए कैंडल लेने आया था। मैंने उससे कहा कि आप वीकएंड पर कैंडल लाइट डिनर का प्लान बना रहे हैं, यह अच्छी बात है। क्यों न उससे पहले आप मछली पकड़ने जाएं! इससे आपका पूरा दिन मौज-मस्ती में गुज़रेगा। और वह मान गया।
Moral
1. संख्या नहीं, गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है।
2. संभावनाओं का कोई ओर-छोर नहीं होता
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