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Wednesday, June 1, 2011

ग़ुस्से की कीलों के गहरे निशान

देश के पूर्वोत्तर में मानो नाम का एक गांव था। गांव में मनु नामक एक व्यक्ति रहता था। उसके परिवार में पति-पत्नी और उनका एक गुस्सैल बेटा था। मनु के बेटे को बहुत अधिक गुस्सा आता था।

उसकी इस प्रवृति को देखते हुए उसके पिता ने एक दिन उसे कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि अब जब भी उसे गुस्सा आए तो वह बाहर की बाड़ पर एक कील गाड़ दे। पहले दिन बच्चे ने बाड़ पर 57 कीलें गाड़ीं।

अगले कुछ सप्ताह के दौरान धीरे-धीरे बाड़ पर ठोकी गई कीलों की संख्या में कमी आती गई और उसने अपने गुस्से को क़ाबू में करना सीख लिया। मनु के बेटे ने पाया कि मजबूत बाड़ पर कील गाड़ने की तुलना में अपने गुस्से को क़ाबू करना कहीं अधिक आसान काम है।

आख़िर एक दिन ऐसा आ गया जब उसे कोई कील नहीं गाड़नी पड़ी। उसने अपने पिता को इस बारे में बताया और पिता ने उससे कहा कि अब वह हर उस दिन एक कील उखाड़े जिस दिन उसने अपने ग़ुस्से को पूरी तरह क़ाबू में रखा हो।

एक-एक करके इसी तरह कई दिन बीत गए और आख़िरकार वह दिन आया जब वह बालक वहां से सारी कीलें उखाड़ने में कामयाब हो गया। उसने अपने पिता को जाकर उत्साह से यह बात बताई। उसकी ख़ुशी में शरीक होते हुए पिता मनु उसका हाथ पकड़कर उसे वापस बाड़ के पास ले गया।

उसने कहा, ‘तुमने अपने गुस्से को पूरा क़ाबू कर बहुत अच्छा किया, मेरे बच्चे। लेकिन उस बाड़ के तमाम छेदों को देखो। वह बाड़ अब कभी भी पहले की तरह नहीं रहेगी। जब तुम गुस्से में कुछ कहते या करते हो तो अपने आसपास के लोगों पर हमेशा ऐसा ही एक निशान छोड़ जाते हो।’

हिम्मत न हारने से मिलती है सफलता

काफी समय पहले की बात है। राजापुर गांव में एक बुजुर्ग धोबी रहता था। वह अकेला ही था। परिवार के नाम पर उसके पास एक खच्चर था जो काफी समय से उसके साथ रहता था। खच्चर भी अपने मालिक की तरह ही बूढ़ा हो चुका था और वह किसी काम नहीं आता था। हालांकि बुजुर्ग धोबी अपने खच्चर को अपना साथी ही मानता था लेकिन अब वह उसका भार उठा नहीं पा रहा था।

एक दिन अचानक वह खच्चर गांव की एक गली में थोड़ा-सा रास्ता भूला और एक सूखे हुए कम गहरे कुंए में जा गिरा। कुंए में गिरे खच्चर की आर्त पुकार सुनकर उसका मालिक वहां पहुंचा। उसने देखा कि खच्चर को कुंए से निकालना आसान नहीं है। तभी धोबी के मन में एक शैतानी खयाल आया कि वैसे भी यह खच्चर अब किसी काम का तो रहा नहीं, क्यों न इसे यहीं दफना दिया जाए।

वह तुरंत गांव के कुछ लोगों को बुला लाया और उसने कुंए में मिट्टी के ढेले डालने शुरू कर दिए। अंदर कुएं में यह सब देख-सुनकर खच्चर को बहुत दुख हुआ। लगातार अपने ऊपर पड़ रहे मिट्टी के ढेलों से खच्चर के हाथ-पांव फूल गए।

उसने मन में सोचा कि अब तो वह बचेगा नहीं। लेकिन तभी उसने दिमाग लगाया और अपने आसपास इकट्ठा होते जा रहे मिट्टी के ढेलों पर चढ़कर ऊपर की ओर बढ़ने लगा। उसे इस दौरान काफी चोट भी लगी, लेकिन वह अपने पीठ पर गिरते ढेले नीचे गिराकर और ऊपर निकलता गया। आखिरकार एक समय ऐसा आया जब वह कुएं से बाहर निकलकर अपनी जान बचाने में कामयाब रहा। उसे खुशी हुई कि किस तरह उसने खुद पर आए संकट को अपने फायदे में बदल लिया।

जीवन में कई बार हमें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है लेकिन हमें उन्हें सकारात्मक तरीके से लेना चाहिए और हार नहीं माननी चाहिए। तभी हमें निश्चित सफलता हासिल होती है।