एक आदमी को मछलियां पकड़ने का बहुत शौक़ था। वह जहां भी जाता, झील या तालाब जरूर खोजता। एक बार वह किसी अनजान शहर में झील किनारे बैठकर मछलियां पकड़ रहा था। वह मछलियां पकड़कर पानी भरी बाल्टी में डालता जाता। जब बाल्टी में ढेर सारी मछलियां तैरने लगीं, तो वह होटल वापस जाने के लिए उठा। इसी समय एक सरकारी कर्मचारी ने उसका रास्ता रोक लिया। कर्मचारी ने रोब दिखाते हुए कहा, ‘क्या आप नहीं जानते कि इस झील पर मछलियां पकड़ना मना है?’
आदमी ने जवाब दिया, ‘नहीं, यहां ऐसा कोई बोर्ड भी नहीं लगा है।’ यह सुनकर कर्मचारी की बांछें खिल गईं। उसने अपना मुंह सटाते हुए कहा, ‘चिंता मत कीजिए, मैं आपका ज्यादा नुक़सान नहीं होने दूंगा। यहां मछली पकड़ने का फ़ाइन सौ रुपए है, पर आप तो मुझे दस ही दे दीजिए और आराम से निकल जाइए।’
अब उस आदमी को ग़ुस्सा आया। पर उसने शांति से कहा, ‘मछली पकड़ना मना है..पर मैं तो अपनी पालतू मछलियों को घुमाने लाया था। मैं रोज उन्हें किसी झील, तालाब या पोखर में छोड़ देता हूं और कुछ समय बाद जब सीटी बजाता हूं, तो वे वापस आ जाती हैं।’
कर्मचारी को उसकी बात पर जरा भी यक़ीन नहीं हुआ। उसने व्यंग्य से कहा, ‘अच्छा! जरा मेरे सामने ऐसा करके तो दिखाइए।’ उस आदमी को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। उसने पूरी बाल्टी झील में उलट दी। और वापस जाने लगा। कर्मचारी ने उसे रोका, बोला, ‘मछलियों को वापस तो बुलाओ!’ उस आदमी ने जवाब दिया, ‘कैसी मछलियां? मैं तो यहां ख़ाली हाथ, झील के किनारे टहलने आया था!’
जैसे को तैसा जरूरी है। अगर कोई बेईमान, ग़लत काम या भ्रष्टाचार के लिए बाध्य करे, तो उसे बेवकूफ़ बनाने के लिए दिमाग़ लगा कर थोड़ा झूठ बोल देने में बुराई नहीं है
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